तुम चले आना

तुम चले आना

 


सुबह होते ही, 

तुम चले आना,

न भटकना इधर उधर,

बस सीधे चले आना,

बहुत खतरे हैं,

इन पुरानी राहों में,

पर तुम डरना मत,

तुम चले आना,

इंतज़ार कर रही हूँ,

इस चारदीवारी में,

बस तुम जल्दी आना,

चाहे दिन ढल जाये,

या चाँद रोशन हो जाये,

तुम रुकना मत,

बस अगली सुबह से पहले,

तुम चले आना, 

सरसों  के खेत से,

पुराने  कुँए तक,

रास्ता जरा सकरा है,

तो जरा आराम से आना,

पर जल्दी चले आना,

अगर तुम्हे याद हो,

उस चौबारे के सामने,

सीधी सी एक सडक है,

उसपे तुम चले आना,

कूचे गलियों से गुजरना,

तो जरा सर झुका लेना,

और चुपचाप चले आना,

देखेंगे वो तुम्हे घूर के,

कोई अनजान समझ के,

पर तुम गुस्सना मत,

अपने घर चले आना,

अरदास है बस इतनी,

आखिरी सांस से पहले,

अपनी माँ से,

मिलने चले आना|


लेखक- आयुष कुमार 

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मोह-माया 

मोह-माया 


बूझो इस समझ को,

कैसी ये काया है,

बिन उजले दिन के,

भला कोई देख पाया है,

सुख से भरी ज़िन्दगी,

बस मोह-माया है,

बस मोह-माया है|


लेखक- आयुष कुमार 

जाम

जाम


जाम लिए हाथों में,

हमारे कदम डगमगाएँ,

देख इसे दूर खड़े लोग,

मुहँ छुपाकर मुस्कुराएँ,

हम नहीं रहे अब वैसे ,

जो उनसे कुछ कह पाएँ,

बदला तो अब इसी में है,

कि हम भी उन्हें देख मुस्कुराएँ|


लेखक- आयुष कुमार 

मुसाफिर

मुसाफिर


मैं मुसाफिर हूँ

अपनी तकदीर खुद लिखता हूँ,

राह न मिले तो,

जंगलों के बीच से गुजरता हूँ,

मैं मुसाफिर हूँ,

सिर्फ अपने मन की सुनता हूँ,

मंजिल न मिले तो,

बीच पड़ाव पर ठहरता हूँ,

हाँ मैं मुसाफिर हूँ,

सिर्फ अपनी मंजिल को देखता हूँ|


लेखक-आयुष कुमार

हास्य रस-3

हास्य रस-3


घर में है  तू प्यारे,

जरा सोच-समझ के बोल,

मत पीट अपने ज्ञान के ढोल,

सुन लिया अगर तेरी लुगाई ने,

तो तेरी पोल पट्टी देगी खोल|


लेखक- आयुष कुमार 

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